याकूब के लिखी चिट्ठी

इआ चिट्ठी के परिचय

याकूब के चिट्ठी बेउहारिक निरदेसन के सार आय, जउन सगले संसार माहीं तितर-बितर होइके रहँइ बाले, परमातिमा के लोगन के खातिर लिखी गे ही। लिखँइ बाले, मसीही आचरन, अउर बेउहार, अउर चाल-चलन के खातिर बेउहारिक ग्यान, अउर मार्ग दरसन से सम्बन्धित निरदेसन काहीं बतामँइ के खातिर, कइअकठे जिन्दा चीजन के उदाहरन दइके उपमा देत हें। ऊँ अनेकव बिसयन माहीं मसीही नजरिया से बिचार करत हें, जइसन अमीरी अउर गरीबी, परिच्छा, निकहा चाल-चलन, पच्छपात, बिसुआस अउर काम, जीभ के उपयोग, बुद्धिमानी, लड़ाई-झगड़ा, घमन्ड अउर दीनता, दुसरे के ऊपर दोस लगाउब, बड़ाई करब, धीरज धरब, अउर प्राथना करब।

इआ चिट्ठी मसीही आचरन के पालन करँइ माहीं बिसुआस के साथय-साथ, कर्म करँइ के महत्व के ऊपर घलाय जोर देत ही।

रूप-रेखा :

भूमिका 1:1

बिसुआस अउर बुद्धिमानी 1:2-8

गरीबी अउर धन-दउलत 1:9-11

परख अउर प्रलोभन 1:12-18

सुनब अउर करब 1:19-27

पच्छपात के खिलाफ चेतउनी 2:1-13

बिसुआस अउर कर्म 2:14-26

मसीही अउर ओखर जीभ 3:1-18

मसीही अउर संसार 4:1—5:6

कइअक मेर के निरदेस 5:7-20

1

याकूब के अभिबादन

1परमातिमा के अउर प्रभू यीसु मसीह के दास याकूब के तरफ से, उन बरहँव कुलन काहीं, जउन सगले संसार माहीं तितर-बितर होइके रहत हें, नबस्कार पहुँचय।

बिसुआस अउर बुद्धिमानी

2हे हमार भाई-बहिनिव, जब तूँ पंचे अनेकव मेर के परिच्छन माहीं परा, त ओही पूरे आनन्द के बात समझा, 3इआ जानिके कि तोंहरे बिसुआस के परखे जाँय से धीरज पइदा होत हय। 4पय धीरज काहीं आपन पूर काम करँइ द्या, जउने तूँ पंचे पूर अउर सिद्ध होइजा, अउर तोंहरे जीबन माहीं कउनव बात के कमी न रहय।

5पय अगर तोंहरे पंचन म से कोहू काहीं बुद्धी के कमी होय, त उआ परमातिमा से माँगय, जउन बिना उलउना दिहे सगलेन काहीं उदारता से देत हें; ओहू काहीं देइहँय। 6पय बिसुआस कइके माँगय, अउर कुछू संका न करय; काहेकि संका करँइ बाला समुंद्र के लहर कि नाईं होत हय, जउन हबा से बहत अउर उछलत ही। 7संका करँइ बाला मनई इआ न समझय, कि हमहीं प्रभू से कुछू मिली। 8उआ मनई दुइचित्ता हय, अउर अपने सगली बातन माहीं चंचल हय।

अमीरी अउर गरीबी

9सहज दसा बाले भाई काहीं घमन्ड करँइ चाही, कि ओही परमातिमा आत्मिक धन दिहिन हीं। 10अउर धनी अपने नीच दसा माहीं घमन्ड करय, काहेकि ओही चारा माहीं फूलँइ बाले फूल कि नाईं झरि जाँइ काहीं हय। 11काहेकि सुरिज के ऊतय निकहा कड़ा घाम होत हय, अउर चारन काहीं झुराय डारत हय, उनखर फूल पत्ती झर जाती हईं, अउर उनखर सुन्दरता खतम होइ जात ही। इहइमेर से धनी मनई घलाय, अपने भाग-दउड़ के साथ खतम होइ जात हय।

परख अउर प्रलोभन

12उआ मनई धन्य हय, जउन परिच्छा माही अटल रहत हय, काहेकि परिच्छा माहीं खरा उतरे के बाद, उआ जीबन के मुकुट पाई, जउने काहीं परमातिमा अपने प्रेम करँइ बालेन काहीं, देंइ के बचन दिहिन हीं। 13परिच्छा के घरी माहीं कोहू काहीं इआ न कहँय चाही, कि “परमातिमा हमार परिच्छा लइ रहे हँय”, काहेकि बुरी बातन से परमातिमा के कउनव लेन-देन नहिं आय, ऊँ कोहू के परिच्छा नहीं लेंय। 14पय हरेक मनई अपनेन बुरी इच्छन माहीं आकरसित होइके, अउर फँसिके परिच्छा माहीं परत हय। 15फेर उआ बुरी इच्छा बढ़त-बढ़त पाप काहीं पइदा करत ही, अउर पाप बढ़िके मउत काहीं जनम देत हय। 16एसे हे हमार पियार भाई- बहिनिव धोखा न खा। 17काहेकि हरेक निकहा बरदान, अउर हरेक उत्तम दान, परमातिमा से मिलत हय, जउन जोतियन के परमपिता आहीं, जउने माहीं न त कउनव बदलाव होइ सकय, अउर न नछत्रन के गति-बिधिअन से पइदा भे छाया से उआ बदल सकय।

सुनिके ओखे मुताबिक चलब

18सत्य के बचन के व्दारा आपन सन्तान बनामँइ के खातिर, परमातिमा हमहीं पंचन काहीं चुनिन हीं, जउने हम पंचे सगले जन, सगले प्रानिन के बीच माहीं, उनखे फसल के पहिल फर साबित होई। 19हे हमार पियार भाई-बहिनिव, इआ बात त तूँ पंचे जनतेन हया, एसे हरेक मनई सुनँय के खातिर तत्पर रहय, अउर बोलँइ माही धीरज रक्खय, अउर क्रोध करँइ माहीं धीम होय। 20काहेकि मनई के क्रोध, परमातिमा के धरम के पालन नहीं कइ सकय। 21एसे बुरे कामन, अउर चारिव कइती फइली दुस्टता से दूरी रह्या, बलकिन उआ बचन काहीं नम्रता से अपनाय ल्या, जउन तोंहरे हिरदँय माहीं बोबा ग हय, उहय तोंहरे प्रान के मुक्ती कइ सकत हय, 22एसे तूँ पंचे, परमातिमा के बचन के मुताबिक चलँइ बाले बना, अउर केबल सुनँइ बाले भर नहीं, जउन खुद अपनेन काहीं धोखा देत हें। 23काहेकि जे कोऊ, परमातिमा के बचन काहीं सुनत त हय, पय ओखे मुताबिक चलय नहीं, त उआ, उआ मनई कि नाईं होत हय, जउन आपन मुँह अइना माहीं देखत हय, 24अउर उआ अपने-आप काहीं अइना माहीं देखिके चला जात हय, अउर हरबिन बिसरि जात हय, कि हम कइसन रहेन हय। 25पय जउन मनई परमातिमा के उआ सगले बिधान काहीं निकहा से मानत हय, जउने से छुटकारा मिलत हय, उआ अपने काम माहीं एसे आसीस पाई, कि उआ सुनिके भूलय नहीं, बलकिन उहयमेर काम करत हय। 26अगर कोऊ अपने-आप काहीं भक्त समझय, अउर अपने जीभ माहीं लगाम न रक्खय, अउर अपने हिरदँय काहीं धोखा देय, त ओखर भक्ती बेकार ही। 27हमरे पिता परमातिमा के लघे सुद्ध अउर निरमल भक्ती इआ आय, कि अनाथन अउर बिधबन के दुख माहीं, हम पंचे उनखर मदत करी, अउर अपने-आप काहीं संसार के बुरे कामन से निस्कलंक रखी।

2

पच्छपात के खिलाफ चेतउनी

1हे हमार भाई-बहिनिव, हमरे महिमावान प्रभू यीसु मसीह माहीं जउन तोंहार बिसुआस हय, उआ बिना पच्छपात के होय। 2काहेकि अगर एकठे मनई सोने के अँगूठी अउर निकहा ओन्हा पहिरे तोंहरे बइठक माहीं आबय, अउर एकठे कंगाल घलाय घिनहे ओन्हा पहिरे आबय। 3अउर तूँ पंचे उआ निकहा ओन्हा पहिरे बाले के मुँह देखिके कहा, कि तूँ उहाँ निकही जघा माहीं बइठा; अउर उआ कंगाल से कहा, कि तूँ इहाँ ठाढ़ रहा, इआ कि हमरे गोड़े के लघे बइठ जा। 4त का तूँ पंचे आपस माहीं भेदभाव नहीं किहा, अउर गलत बिचार से न्याय करँइ बाले न ठहरिहा? 5हे हमार पियार भाई-बहिनिव, सुना; काहे परमातिमा इआ संसार के कंगालन काहीं नहीं चुनिन, कि बिसुआस माहीं धरमी, अउर उआ राज के अधिकारी होंय, जउने के वादा परमातिमा उनसे किहिन हीं, जउन उनसे प्रेम रक्खत हें? 6पय तूँ पंचे उआ कंगाल के अपमान किहा हय; काहे धनी मनई तोंहरे ऊपर अत्याचार नहीं करँय, अउर काहे उँइन तोंहईं कचेहरिन माहीं जबरई खसेल-खसेल नहीं लइ जाँय? 7काहे उँइन मसीह के उआ उत्तम नाम के बुराई नहीं करँय, जउन तोंहईं दीन ग हय? 8तऊ अगर तूँ पंचे पबित्र सास्त्र के इआ बचन के मुताबिक, कि “तूँ अपने परोसी से उहयमेर प्रेम करा, जउनमेर तूँ अपने-आप से करते हया” त सही-सही उआ राज के बिधान काहीं पूर करते हया, त निकहय करते हया। 9पय अगर तूँ पंचे पच्छपात करते हया, त पाप करते हया; अउर बिधान तोंहईं अपराधी ठहराबत हय। 10काहेकि जे कोऊ सगले बिधान के पालन करत हय, पय एकय बात माहीं चूक जाय, त उआ सगली बातन माहीं दोसी ठहरी। 11एसे कि जउन इआ कहिन हीं, कि तूँ कउनव मेहेरिआ से अनुचित सम्बन्ध न बनाया, उँइन इहव कहिन हीं, कि तूँ कतल न किहा, एसे अगर तूँ कउनव मेहेरिआ से अनुचित सम्बन्ध नहीं बनाया, पय कतल किहा, तऊ तूँ बिधान के पालन न करँइ बाले ठहरिहा। 12तूँ पंचे उँइ मनइन कि नाईं बचन बोला, अउर काम घलाय करा, जिनखर न्याय उआ बिधान के मुताबिक होई, जउने से छुटकारा मिलत हय। 13काहेकि जउन मनई दुसरे के ऊपर दया नहीं किहिस, ओखर न्याय बिना दया के होई, दया न्याय के ऊपर बिजयी होत ही।

बिसुआस अउर काम

14हे हमार भाई-बहिनिव, अगर कोऊ कहय, कि हमहीं बिसुआस हय, पय उआ बिसुआस के मुताबिक काम न करत होय, त ओसे कउनव फायदा न होई, का इआमेर के बिसुआस कबहूँ ओखर छुटकारा कइ सकत हय? 15अगर कउनव भाई इआ कि बहिनी बिना ओन्हा पहिरे होंय, अउर उनहीं रोज खाँय के कमी होय। 16अउर तोंहरे पंचन म से कोऊ उनसे कहय, कुसल से चले जा, तूँ गरम रहा, अउर अघान रहा; पय जउन चीज देंह के खातिर जरूरी हईं, उआ ओही न देय, त कउन फायदा? 17उहयमेर बिसुआस घलाय, अगर कर्म समेत न होय, त अपने सुभाव माहीं मरे कि नाईं हय।

18पय कोऊ इआ कहि सकत हय, कि तोंहईं बिसुआस हय, अउर हम काम करित हएन; तूँ आपन बिसुआस हमहीं बिना काम के त देखाबा; अउर हम आपन बिसुआस अपने निकहे कामन के द्वारा तोंहईं देखाउब। 19तोंहईं बिसुआस हय, कि एकयठे परमातिमा हें; तूँ निकहा करते हया; बुरी आत्मा घलाय बिसुआस रखती हईं, कि एकयठे परमातिमा हें, अउर ऊँ थर-थरात रहती हईं। 20पय हे मूरुख मनई, काहे तँय इहव नहीं जनते, कि बिना कर्म के बिसुआस बेकार हय? 21जब हमार कुल पिता अब्राहम अपने लड़िका इसहाक काहीं बेदी के ऊपर चढ़ाइन, त काहे उँइ कर्म से धरमी नहीं कहाइन रहा। 22एसे तूँ इआ देख लिहा हय, कि बिसुआस उनखे कामन के साथ मिलिके, कइसन प्रभाव डारिस ही, कि उनखे कामन से बिसुआस सिद्ध भ। 23अउर पबित्र सास्त्र के इआ बचन पूर भ, कि अब्राहम परमातिमा के ऊपर बिसुआस किहिन रहा हय, एहिन से ऊँ परमातिमा के नजर माहीं निरदोस ठहराए गे रहे हँय, अउर ऊँ परमातिमा के साथी कहाए। 24एसे तूँ पंचे देख लिहा हय, कि मनई केबल बिसुआस भर से नहीं, बलकिन कामन से घलाय धरमी ठहरत हय। 25उहयमेर राहाब बेस्या घलाय, जब उआ दूतन काहीं अपने घर माहीं उतारिस, अउर दुसरे गइल से बिदा किहिस, त का उआ कर्मन से धरमी न ठहरी? 26एखर सार इआ हय, कि जइसन देंह आत्मा के बिना मरी हय, उहयमेर बिसुआस घलाय कर्म बिना मरा हय।

3

जीभ काहीं काबू माहीं करब

1हे हमार भाई-बहिनिव, तोंहरे पंचन म से खुब जने उपदेसक न बनँय, काहेकि तूँ पंचे त जनतेन हया, कि हम पंचे जउन उपदेस देंइ बाले हएन, त हमार पंचन के न्याय अधिक कड़ाई के साथ कीन जई। 2एसे कि हम सगले जने कइएक बेरकी अपने बातन माहीं चूक जइत हएन, जे कोऊ अपने बातन माहीं नहीं चूकय, उहय त सिद्ध मनई आय; अउर उहय अपने सगले देंह माही लगाम लगाय सकत हय। 3जब हम पंचे अपने काबू माहीं करँइ के खातिर, घोड़न के मुँहे माहीं करिआरी लगाइत हएन, त हम उनखे सगले देंह काहीं घुमाय सकित हएन। 4देखा, जल जिहाज घलाय, केतने बड़े भारी होत हें, अउर तेज आँधी माहीं चलाए जात हें; तऊ चलामँइ बाला एकठे छोट काहीं पतबार के व्दारा, अपने मन के मुताबिक ओही घुमाय देत हय। 5उहयमेर जीभ घलाय एकठे छोट काहीं देंह के अंग आय, अउर बड़ी-बड़ी बड़ाई मारत ही, देखा थोड़ी क आगी से बड़े-बड़े जंगलन माहीं आगी लग जात ही। 6जीभव आगिन कि नाईं होथी, इआ जीभ हमरे पंचन के देंह माहीं अधरम से भरा एकठे अंग आय, अउर इहय सगले देंह माहीं कलंक लगाबत ही, अउर सगले जीबन काहीं बरबाध कइ देत ही। इआ जीभ नरक के आगी कि नाईं धँधकत रहत ही। 7काहेकि बन माहीं रहँइ बाले हरेकमेर के जानबर, पंछी, अउर रेंगँइ बाले जीव-जन्तु, पानी माहीं रहँइ बाले सगले जीव-जन्तु त मनई के काबू माहीं होइ सकत हें, अउर होऊ गे हँय। 8पय जीभ काहीं कउनव मनई अपने काबू माहीं नहीं कइ सकय; उआ एकठे अइसन बलाय ही, जउन कबहूँ रुकिन नहीं सकय; उआ प्रान काहीं नास करँइ बाले बिस से भरी ही। 9एहिन से हम पंचे प्रभू अउर पिता परमातिमा के अराधना करित हएन; अउर एहिन से मनइन काहीं जउन परमातिमा के स्वरूप माहीं पइदा भे हँय, सराप देइत हएन। 10एकय मुँहे से सराप अउर धन्यबाद दोनव निकरत हें, हे हमार भाई-बहिनिव, तोंहईं इआमेर से न होंइ चाही। 11का पानी के एकय झिन्ना से, मीठ अउर खारा दोनव मेर के पानी निकर सकत हय? 12हे हमार भाई-बहिनिव, का अंजीर के बिरबा माहीं जैतून, इआ कि अंगूर के बिरबा से अंजीर के फर लग सकत हय? उहयमेर खारा पानी के झिन्ना से मीठ पानी नहीं निकर सकय। 13तोंहरे पंचन म से ग्यानी अउर हुसिआर को हय? जे कोऊ इआमेर होय, उआ अपने कामन काहीं निकहा चाल-चलन से नम्रता समेत देखाबय, जउन ग्यान से पइदा होत हय। 14पय अगर तूँ पंचे अपने मन माहीं बड़ी इरसा अउर बिरोध रखते हया, त सत्य के बिरोध माहीं घमन्ड न किहा, अउर न त झूँठय बोल्या। 15इआ परमातिमा के तरफ से आमँइ बाला ग्यान न होय, बलकिन इआ त संसारिक आय, आत्मिक न होय, बलकिन सइतान के आय। 16एसे कि जहाँ इरसा अउर बिरोध होत हय, उहाँ लड़ाई-झगड़ा अउर हरेकमेर के गलत काम घलाय होत हें। 17पय जउन ग्यान परमातिमा के तरफ से आबत हय, उआ पहिले त पबित्र होत हय, अउर मिलनसार, कोमल अउर मीठ बोलँइ बाला अउर दयालू, अउर निकहे फर से लदा, अउर बिना पच्छपात के, अउर बिना कपट के होत हय। 18अउर मेल-मिलाप करामँइ बालेन के खातिर, धारमिकता के फल मेल-मिलाप के साथ बोबा जात हय।

4

परमातिमा के अधीन रहा

1तोंहरे बीच माहीं लड़ाई-झगड़ा काहे होत हें? तूँ पंचे आपस माहीं लड़ाई-झगड़ा काहे करते हया? तोंहरे मन माहीं जउन सुख-बिलास के इच्छा रहती हईं, उनहिन के कारन इआ सगला होत हय। 2तूँ पंचे चहते त हया, पय तोंहईं मिल नहीं पाबय, काहेकि तोंहरे मन माहीं इरसा हय, अउर तूँ पंचे दुसरे के कतल करते हया, तऊ जउन चहते हया, उआ तोंहईं मिल नहीं पाबय, एहिन से लड़ाई-झगड़ा करते हया, अउर अपने मनचाही चीजन काहीं पउते नहिं आह्या, काहेकि तूँ पंचे उनहीं परमातिमा से नहीं मगते आह्या? 3तूँ पंचे मगते त हया, अउर पउते नहिं आह्या, एसे कि बुरी इच्छा से मगते हया, जउने अपने भोग-बिलास माहीं उड़ाय द्या। 4हे ब्यभिचार करँइ बालिव! काहे तूँ पंचे नहीं जनते आह्या, कि संसार से दोस्ती करब, परमातिमा से दुसमनी करब आय? एसे जे कोऊ संसार के दोस्त होंइ चाहत हय, उआ अपने-आप काहीं परमातिमा के बइरी बनाबत हय। 5का तूँ पंचे पबित्र सास्त्र के बातन काहीं बेकार समझते हया, जउने आत्मा काहीं उँइ हमरे पंचन के भीतर बसाइन हीं, का उआ अइसन इच्छा करत हय, जउने के प्रतिफल इरसा होय? 6उँइ त अउरव किरपा करत हें; इआ कारन से पबित्र सास्त्र माहीं इआ लिखा हय, कि परमातिमा घमन्ड करँइ बालेन के बिरोध करत हें, पय जे कउनव बात के घमन्ड नहीं करँय, उनखे ऊपर किरपा करत हें। 7एसे परमातिमा के आधीन होइजा; अउर सइतान के सामना करा, त उआ तोंहरे लघे से भाग जई। 8परमातिमा के लघे आबा, त उँइ तोंहरे लघे अइहँय, हे पाप करँइ बाले मनइव, आपन-आपन चाल-चलन सुधारा; अउर हे दुइचित्त रखँइ बाले मनइव, अपने हिरदँय काहीं पबित्र करा। 9तूँ पंचे हँसा न, सोक करा, बिलाप करा, अउर दुखी होइके रोबा, काहेकि तूँ पंचे परमातिमा के नजर माहीं खुब पाप किहा हय। 10प्रभू के आँगे दीन बना, त ऊँ तोंहईं सिरोमनि बनइहँय।

दुसरेन के ऊपर दोस न लगाबा

11हे भाई-बहिनिव, एक दुसरे के बदनामी न करा, जे कोऊ बिसुआसिअन के बदनामी करत हय, इआ बिसुआसिअन के ऊपर दोस लगाबत हय, उआ परमातिमा के बिधान के बदनामी करत हय, अउर बिधान के ऊपर दोस लगाबत हय, त तूँ बिधान के मुताबिक चलँइ बाले नहीं, बलकिन ओखर हाकिम ठहरिहा। 12बिधान देंइ बाले, अउर ओखर न्याय करँइ बाले, त एकयठे हँय, जिनहीं बचामँय, अउर नास करँय के अधिकार हय; त पुनि अपने साथी के न्याय करँइ बाले, तूँ को होते हया?

घमन्ड के बिरोध माहीं चेतउनी

13तूँ पंचे जउन इआ कहते हया, कि आज इआ कि काल्ह, हम पंचे कउनव दुसरे सहर माहीं जाइके, उहाँ एक बरिस बिताउब, अउर धंधा कइके फायदा कमाब। 14अउर इआ नहीं जनते आह्या, कि काल्ह का होई: सुन त ल्या, तोंहार जीबन हइअय का आय? तूँ पंचे त मानो भाफ कि नाईं हया, जउन थोरी देर त देखाई देत ही, अउर पुनि हेराय जात ही। 15एखर उल्टा तोंहईं, इआ कहँइ चाही, कि अगर प्रभू चइहँय, त हम पंचे जिअत रहब, अउर इआ काम, कि उआ काम घलाय करब। 16पय अपना पंचे अपने कउनव मेर के बातन के ऊपर घमन्ड न करी; इआमेर के सगला घमन्ड बुरा होत हय। 17एसे जे कोऊ भलाई करँय जानत हय, अउर नहीं करय, त इआ पाप आय।

5

धनमानन काहीं चेतउनी

1हे धनमानव सुना, जउन बिपत्ती तोंहरे ऊपर आमँइ बाली हईं, उनखे खातिर गोहार मार-मारके रोबा। 2तोंहार धन सड़ चुका हय, अउर तोंहरे ओन्हन काहीं किरबा खाय चुके हँय। 3तोंहरे सोन-चाँदी माहीं काई लगिगे ही; अउर उआ काई तोंहरे बिरोध माहीं गबाही देई, अउर आगी कि नाईं तोंहार माँस खाय जई, तूँ पंचे जउन इआ अन्तिम समय माहीं धन सम्पत्ती एकट्ठा किहा हय। 4देखा, जउन मजूर तोंहार खेत काटिन हीं, उनखर उआ मजूरी, जउन तूँ पंचे धोखा दइके धइ लिहा हय, उआ चिल्लाय रही हय, अउर खेत माहीं काम करँइ बालेन के दोहाई, सेनन के प्रभू के कानन तक पहुँचिगे ही। 5तूँ पंचे धरती माहीं भोग-बिलास के जीबन जिअा हय, अउर अपने-आप काहीं भोग-बिलास माहीं बोरे रह्या हय। इआमेर से परमातिमा के न्याय करँइ के दिन के खातिर खुद काहीं तइआर किहा हय। 6तूँ पंचे धरमी काहीं दोसी बनाइके मारि डारे हया; काहेकि ऊँ तोंहार सामना नहीं किहिन।

दुख माहीं धीरज धरब

7एसे हे भाई-बहिनिव, प्रभू के दुसराय आमँइ तक धीरज धरा, उआ किसान के सुध करा, जउन अपने खेत के कीमती फसल के आसा रखिके, पहिल अउर अन्तिम बरसा होंइ तक धीरज धरत हय। 8तुहूँ पंचे धीरज धरा, अउर अपने हिरदँय काहीं मजबूत करा, काहेकि प्रभू के दुसराय आउब लघेन हय। 9हे भाई-बहिनिव, एक दुसरे के ऊपर दोस न लगाबा जउने तुहूँ पंचे दोसी न ठहरा, देखा न्याय करँइ बाले दुअरा माहीं ठाढ़ हें। 10हे भाई-बहिनिव, जउन परमातिमा के सँदेस बतामँइ बाले, प्रभू के नाम से बात किहिन, उनहीं दुख उठामँइ अउर धीरज धरँय माहीं आदर्स माना। 11देखा, हम पंचे धीरज धरइँ बालेन काहीं धन्य कहित हएन; तूँ पंचे अय्यूब के धीरज के बारे माहीं सुनबय भए होइहा, अउर प्रभू उनहीं धीरज के बदले माहीं जउन आसीस दिहिन तय, ओहू काहीं जनते होइहा, कि प्रभू केतने दयालू अउर करुनामय हें।

12पय हे हमार भाई-बहिनिव, सगलेन से बड़ी बात इआ हय, कि कसम न खया; न त स्वरग के, न धरती के, न कउनव चीज के, पय तोंहार बातचीत हाँ के हाँ, अउर नहीं के नहीं होय, जउने तूँ पंचे दन्ड पामँइ बाले न ठहरा।

प्राथना के सक्ती

13अगर तोंहरे पंचन म से कोऊ दुखी होय, त उआ प्राथना करय, अउर खुसी होय, त उआ अराधना के भजन गाबय। 14अगर तोंहरे पंचन म से कोऊ बिमार होय, त मसीही मन्डली के अँगुअन काहीं बोलाबय, अउर उँइ प्रभू के नाम से ओखे तेल लगाइके प्राथना करँय। 15अउर बिसुआस के प्राथना से रोगी बच जई, अउर प्रभू ओही नीक कइ देइहँय; अउर अगर उआ पापव किहिस होई, त ऊँ घलाय माफ होइ जइहँय। 16एसे तूँ पंचे आपस माहीं एक दुसरे के आँगे, अपने-अपने पापन काहीं सोइकार कइल्या; अउर एक दुसरे के खातिर प्राथना करा, जउने नीक-सूख होइजा; धरमी मनइन के प्राथना सक्तिसाली, अउर प्रभावसाली होत ही, जेसे बहुत कुछ होइ सकत हय। 17एलिय्याह नबी हमरेन पंचन कि नाईं दुख-सुख भोगँइ बाले मनई रहे हँय; अउर ऊँ गिड़गिड़ाइके प्राथना किहिन, कि बारिस न होय; त साढ़े तीन बरिस तक भुँइ माहीं पानी नहीं बरसा। 18पुनि ऊँ प्राथना किहिन, त अकास से बरसा भे, अउर भुँइ माहीं फसल पइदा भे।

19हे हमार भाई-बहिनिव, अगर तोंहरे पंचन म से कोऊ सत्य के गइल से भटक जाय, अउर कोऊ ओही लउटाय लाबय। 20त उआ जान लेय, कि जे कोऊ कउनव भटके पापी मनई काहीं लउटाइके ले अई, त उआ एकठे प्रान काहीं मउत से बचाई, अउर ओखे अनेकव पापन के माफ करे जाँय के कारन बनी।